4 साल मोदी सरकार - 57 प्रतिशत नागरिक सरकार के कार्य से संतुष्ट


  • • 28 प्रतिशत को लगता है कि सरकार अपेक्षाओं से बढ़कर काम कर रही है, 29 प्रतिशत का मानना है कि सरकार अपेक्षा पर खरी उतर रही है जबकि 43 प्रतिशत का मानना है कि सरकार अपेक्षाओं के अनुरूप काम नहीं कर रही है।
  • • वैश्विक स्तर पर भारत की छवि को सुधारने में, पाकिस्तान संबंधी मामलों से निपटने में, आतंकवाद से लड़ने में, आधारभूत सुविधाओं के विकास और कर संबंधी तकलीफों को कम करने में सरकार ने काफी अच्छा प्रदर्शन किया है।
  • • महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों को कम करने में, रोजगार पैदा करने में, किसानों के जीवन को बेहतर बनाने में, निर्वाह व्यय कम करने में और स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में नागरिकों ने सरकार को बहुत कम अंक दिए हैं।
  • • समय के साथ ज्यादातर प्रदर्शन मापदण्ड गिरावट दिखा रहे हैं क्योंकि स्थापित अपेक्षाओं और दैनिक जीवन पर प्रभाव के बीच का अंतर बढ़ता जा रहा है।

14 मई 2018, नई दिल्लीः चार साल पहले नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में एन.डी.ए. ने 325 संसदीय सीटों के साथ चुनाव में भारी विजय प्राप्त करके जनमत सर्वेक्षकों को चैंका दिया था, और सरकार बनाई थी। इस जीत के बाद एक आक्रामक अभियान चलाया गया जिसमें साफ-सुथरी सरकार और जीवन के सभी क्षेत्रों में सुधार लाने का वादा किया गया था। मोदी के रूप में प्रभावशाली व्यक्तित्व के साथ एक नए चेहरे ने लोगों की अपेक्षाओं को बढ़ा दिया कि परिवर्तन संभव है और हमारा देश बेहतर दिन देख सकता है। मोदी का मंत्र है - शासन मंडली को कम करना और शासन प्रणाली को बेहतर करना। मोदी सरकार भारत में व्यापार को आसान बनाने के लिए लाल फीताशाही को कम करना चाहती थी। वार्षिक प्रदर्शन और नागरिकों की इस विषय में धारणा जानने के लिए लोकलसर्कल्स नागरिकों की प्रतिक्रिया जानने के लिए एक विस्तृत सर्वेक्षण करता हैं कि केन्द्रीय सरकार ने किस तरह का प्रदर्शन किया है। इस सर्वेक्षण का नतीजा यह दिखाता है कि सरकार ने 23 विभिन्न क्षेत्रों या मानदण्डों पर कैसा प्रदर्शन किया है? यह मानदण्ड सरकार द्वारा उसके घोषणापत्र में किए गए वादों या लोकलसर्कल्स के मंच पर नागरिकों द्वारा अभिज्ञात मुद्दों पर आधरित है। इस साल के सर्वेक्षण में भारत के 250 शहरों के लगभग 62000 नागरिकों के 1,75,000 मत प्राप्त हुए हैं और यह अपने तरह का सबसे बड़ा सर्वेक्षण है जहाँ नागरिक, सरकार के प्रदर्शन का आकलन करते हैं।

इस साल, कुल 57 प्रतिशत नागरिक कहते हैं कि पिछले चार सालों में सरकार ने या तो अपेक्षाओं के अनुरूप या उससे बढ़कर काम किया है। लगभग 28 प्रतिशत नागरिकों ने कहा कि सरकार ने उनकी अपेक्षाओं से बढ़कर काम किया है और इस मापीय में पिछले वर्ष के 17 प्रतिशत और 2016 के 18 प्रतिशत की तुलना में नाटकीय सुधार हुआ है। जबकि केवल 29 प्रतिशत नागरिकों ने कहा कि सरकार उनकी अपेक्षाओं पर खरी उतरी है और यह प्रतिशत पिछले साल के 44 प्रतिशत और 2016 के 46 प्रतिशत की तुलना में नीचे आया है। 2016 में 36 प्रतिशत का मानना था कि सरकार उनकी अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरी है और यह प्रतिशत 2017 में बढ़कर 39 प्रतिशत हो गया और 2018 में 43 प्रतिशत हो गया। इसका अर्थ है कि सरकार के प्रदर्शन के विषय में राय अब ज्यादा ध्रुवीकृत है जिसमें अपेक्षाओं से बढ़कर और अपेक्षाओं के अनुरूप न होने, दोनों के प्रतिशत बढ़े हैं।

चार वर्ष पूर्ण होने पर 56 प्रतिशत नागरिक यह मानते हैं कि सरकार चुनाव के पहले के अपने घोषणापत्र में किए गए वादों को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ रही है जोकि पिछले साल के 59 प्रतिशत की तुलना में थोड़ा कम है। आमतौर पर नागरिकों की राजनीतिक संस्थानों या सत्तारूढ़ पार्टी के प्रति अपेक्षाएँ बहुत जल्दी गिरती है। यह अपेक्षा प्रतिशत, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के राष्ट्रपतियों के स्वीकृति मूल्यांकन (ंचचतवअंस तंजपदह) के समान है और बावजूद इसके कि यह हर वर्ष गिरता जा रहा है, यह अभी भी मोदी सरकार के लिए काफी ऊंचा प्रतिशत है।

मोदी सरकार के शासन में जीवन स्तर जीवन स्तर के सबसे महत्वपूर्ण संकेतकों में से एक है घरेलू बजट पर कीमतों का प्रभाव। जबकि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक, अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीती देते हैं, यह इस बात का अच्छा संकेतक नहीं है कि घरेलू बजट किस प्रकार से प्रभावित हो रहे हैं। लगभग 60 प्रतिशत नागरिकों ने कहा कि आवश्यक वस्तुओं की कीमतें और निर्वाह व्यय कम नहीं हुआ है। केवल 33 प्रतिशत नागरिकों का मानना है कि पिछले चार सालों में आवश्यक वस्तुओं की कीमतें कम हुई हैं, जबकि तीन साल पूर्ण होने पर 28 प्रतिशत लोग मानते थे कि वस्तुओं की कीमतें कम हुई हैं। इसका अर्थ है कि जी.एस.टी. और विमुद्रीकरण जिनमें मुद्रास्फीती घटक होते हैं, के बाद किसी ना किसी रूप में मूल्य स्थिरीकरण हुआ है।

डर की उपस्थिति बहुत ही प्रबल भावना है जिसका सरकार के प्रदर्शन पर प्रत्यक्ष प्रभाव होता है। अगर किसी सरकार के शासनकाल में लोग सुरक्षित महसूस नहीं करते तो उनके द्वारा फिर से उस सरकार को चुने जाने की संभावना कम होती है। लगभग 32 प्रतिशत नागरिकों को महसूस होता है कि पिछले चार सालों में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराध में कमी आई है जबकि 58 प्रतिशत को लगता है कि कोई कमी नहीं आई है। पिछले साल, 60 प्रतिशत नागरिकों का मानना था कि महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों में कमी नहीं आई है जो पिछले वर्ष के 38 प्रतिशत से ज्यादा था। बच्चों के बलात्कार, अपहरण और हत्या के मामले नियमित तौर पर अखबारों की सुर्खियों में हैं। बैंगलुरू, सोनीपत और कठुआ जैसी घटनाएँ आम नागरिकों को लगातार डरा रही है।

इन सब के बीच में स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में केवल 32 प्रतिशत नागरिक मानते हैं कि पिछले चार सालों में स्वास्थ्य सुविधाएँ और सेवाएँ बेहतर हुई है जबकि 62 प्रतिशत का कहना है कि कोई सुधार नहीं हुआ है। यह पिछले साल के 23 प्रतिशत से बेहतर है जिन्होंने तीन साल पूर्ण होने पर कहा था कि स्वास्थ्य सेवाओं में कोई सुधार नहीं हुआ है।

तीन साल के सर्वेक्षण में 35 प्रतिशत नागरिकों ने कहा था कि स्वच्छ भारत अभियान की वजह से उनका शहर ज्यादा स्वच्छ हुआ है। इस साल यह प्रतिशत बढ़कर 43 प्रतिशत नागरिकों तक चला गया है जो यह कहते हैं कि उनका शहर ज्यादा स्वच्छ हुआ है जबकि 51 प्रतिशत का कहना है कि स्वच्छ भारत अभियान का उनके शहर की स्वच्छता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा है।

लगभग 65 प्रतिशत नागरिक अपने परिवार के भविष्य के बारे में आशावादी है जबकि 27 प्रतिशत का कहना है उन्हें बहुत ज्यादा आशा नहीं है। यह पिछले साल के उस 69 प्रतिशत की तुलना में थोड़ी गिरावट है जो आशावादी थे।

अर्थव्यवस्था की स्थिति देश भर में साम्यिक विकास मूल रूप से आधारभूत सुविधाओं की स्थिति पर आधारित है। नागरिकों से पूछा गया कि क्या पिछले चार सालों में नई आधारभूत सुविधाओं (सड़क, बिजली, सिंचाई, ब्राडबैंड आदि) का पर्याप्त विकास हुआ है। लगभग 65 प्रतिशत ने कहा ‘हाँ’ जबकि 29 प्रतिशत ने ‘नहीं’ कहा। पिछले साल से इस साल के प्रतिशत में कोई बदलाव नहीं हुआ है लेकिन यह दो साल पूर्ण होने पर किए जाने वाले सर्वेक्षण के 72 प्रतिशत से नीचे आया है।

2014 में जब मौजूदा सरकार सत्ता में आई थी तब विश्व बैंक की व्यापार करने की वार्षिक सुगमता के मूल्यांकन में भारत को 134 क्रम मिला था। 2017 में उसी रिपोर्ट में भारत 100 क्रम पर रखा गया है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि भारत ने ‘व्यापार करने’ के 10 में से 8 सूचकांकों में सुधार अमल में लाए हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह भी कहा है कि सरकार इस क्रम को सुधारने और ‘सुधार, प्रदर्शन और परिवर्तन’ के मंत्र के साथ और अधिक आर्थिक विकास करने के प्रति प्रतिबद्ध है। लगभग 46 प्रतिशत नागरिक मानते हैं कि पिछले चार सालों में भारत में व्यापार करना आसान हो गया है जबकि 39 प्रतिशत कहते हैं कि ऐसा नहीं है। यह 2017 की तुलना में बेहतर है जब यह प्रतिशत 36 था लेकिन 2016 के 60 प्रतिशत की तुलना में बहुत ही कम है।

लगभग 35 प्रतिशत नागरिक मानते हैं कि पिछले चार सालों में बेरोजगारी की दर कम हुई है जबकि 54 प्रतिशत कहते हैं कि यह कम नहीं हुई है। तीन साल पूर्ण होने पर लगभग 63 प्रतिशत नागरिकों ने कहा था कि यह कम नहीं हुई है और 2 साल पूर्ण होने पर 43 प्रतिशत ने कहा था कि देश में बेरोजगारी की दर कम नहीं हुई है।

इस साल लगभग 64 प्रतिशत लोग कहते हैं कि कर अधिकारियों द्वारा दी जाने वाली तकलीफों में काफी हद तक कमी आई है, कराधान मूल्यांकन और जांच प्रणाली में उल्लेखनीय सुधार दिखाते हुए यह 2016 और 2017 के प्रतिशत से ज्यादा है। इनमें से कुछ इस तथ्य की वजह येे भी है कि विमुद्रीकरण और जी.एस.टी. के बाद सरकार ने प्रवर्तन पर अधिक रूढ़िवादी दृष्टिकोण अपनाया था।

भारत एक कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था है। किसानों की स्थिति के बारे में 47 प्रतिशत नागरिकों का कहना था कि पिछले चार सालों में किसानों के जीवन में कोई सुधार नहीं हुआ है जबकि 37 प्रतिशत का कहना था कि सुधार हुआ है।

एक दूसरे सर्वेक्षण में 60 प्रतिशत नागरिकों को कहना था कि उन्हें नहीं लगता कि जी.एस.टी. लागू होने के बाद कीमतो में कमी आई है या मासिक खर्च में कमी आई है जबकि 37 प्रतिशत का कहना था कि उनके अनुसार जी.एस.टी. के बाद कीमतों में कमी आई है।

भ्रष्टाचारलगभग 49 प्रतिशत नागरिकों का मानना है कि पिछले चार सालों में भारत में भ्रष्टाचार कम हुआ है जबकि 44 प्रतिशत का मानना है कि कम नहीं हुआ है। इस सवाल के जवाब में पिछले साल 47 प्रतिशत नागरिकों ने कहा था भारत में भ्रष्टाचार कम हुआ है।

सांप्रदायिकता, आतंकवाद और विदेशी मामले भारतीयों के लिए विदेशियों की भारत के विषय में धारणा बहुत महत्वपूर्ण है, यह स्वीकृति की चाह है जो भारत के औपनिवेशिक अतीत की देन है। यह पूछे जाने पर कि विश्व भर में भारत की छवि और प्रभाव में सुधार हुआ है कि नहीं, 82 प्रतिशत ने कहा ‘हाँ’ जबकि 13 प्रतिशत ने ‘नहीं’ कहा। यह पिछले वर्ष के 81 प्रतिशत से थोड़ा बेहतर है और 2016 के 90 प्रतिशत से कम है जिन्होंने ‘हाँ’ कहा था।

नागरिकोें से यह भी पूछा गया कि क्या वह पिछले चार सालों में भारत सरकार के सीमाओं पर होने वाले निरंतर टकरावों का सामना करने और पाकिस्तान के साथ संबंधों को संभालने के तरीके को सम्मति देते हैं। लगभग 74 प्रतिशत का कहना है कि वह काफी हद तक बेहतर हुए हैं जबकि 24 प्रतिशत का मानना था कि सरकार के तरीके सही नहीं हैं। पाकिस्तान से निपटने के सरकार के तरीके पर सम्मति, 2016 में केवल 34 प्रतिशत थी जो 2017 की सर्जिकल स्ट्राइक के बाद तेजी से 64 प्रतिशत तक चली गई। सरकार ने पाकिस्तान के खिलाफ और आतंकवाद के खिलाफ सहिष्णुता के विषय में कुछ कठोर कदम उठाए हैं।

लोगों से पूछा गया कि क्या वे मानते हैं कि पिछले कुछ सालों में आतंकवाद और भारतीयों के खिलाफ दहशतवादी कार्य कम हुए हैं। लगभग 61 प्रतिशत ने ‘हाँ’ कहा, जबकि 35 प्रतिशत इससे असहमत थे। पिछले साल 51 प्रतिशत और उसके पिछले साल 72 प्रतिशत ने कहा कि देश में आतंकवादी घटनाओं में कमी हुई है।

सांप्रदायिकता के मामले में 50 प्रतिशत नागरिेक महसूस करते हैं कि पिछले कुछ सालों में सरकार ने इन मामलों को काफी अच्छी तरह से संभाला है जबकि 45 प्रतिशत का मानना था कि इन मामलों को ठीक तरह से नहीं संभाला है। 2017 में संतुष्ट लोगों का प्रतिशत 61 था और 2016 में यह 63 प्रतिशत था। इस मामले में किंचित ही सही पर लगातार प्रतिशत कम होता जा रहा है।

संसदीय कार्यवाही, सांसद की भागीदारी और वी.आई.पी. संस्कृति लगभग 40 प्रतिशत नागरिकों का कहना था कि सरकार ने संसद का अच्छी तरह से संचालन किया है और कानून में जरूरी बदलाव लाने के विषय में योग्य काम किया है। लेकिन वैयक्तिक सांसदों से असंतुष्टि का प्रमाण काफी ऊंचा था क्योंकि केवल 18 प्रतिशत नागरिकों का मानना था कि उनके द्वारा चुना गया सांसद अपने निर्वाचन क्षेत्र के मुद्दों का हल निकालने पर ध्यान देता है।

लाल बत्ती पर प्रतिबंध लगाने के कदम को भारत में वी.आई.पी. संस्कृति को कम करने की दिशा में प्रमुख कदम माना गया। लेकिन अगर हम अगले सर्वेक्षण पर यकीन करे तो अभी भी 51 प्रतिशत नागरिकों को लगता है कि पिछले चार सालों में भारत में वी.आई.पी. संस्कृति कम नहीं हुई है। 43 प्रतिशत का मानना है कि वी.आई.पी. संस्कृति कम हुई है। नागरिकों का कहना है कि वी.आई.पी. प्रवेश, वी.आई.पी. कोटा, वी.आई.पी. क्षेत्र आदि अभी भी काफी आम है और भारत में वी.आई.पी. संस्कृति को कम करने के लिए ज्यादा प्रभावी कदम उठाने की जरूरत है।

सरकार के प्रमुख ध्येयों के विषय में 58 प्रतिशत नागरिकों का मानना था कि पिछले कुछ सालों में सरकार की सबसे ज्यादा प्रभावशाली योजना ‘प्रत्यक्ष लाभ अंतरण’ है और 9 प्रतिशत को ‘मेक इन इंडिया’ सबसे ज्यादा प्रभावशाली लगी। 19 प्रतिशत को ‘स्वच्छ भारत’ जबकि 14 प्रतिशत को ‘जन धन योजना’ प्रभावी लगी।

सर्वेक्षण मंच और जनसांख्यिकी केन्द्रीय सरकार के प्रदर्शन और प्रभाव को मापने के लिए भारत के प्रमुख नागरिक भागीदारी मंच लोकलसर्कल्स द्वारा केन्द्रीय सरकार के चार साल का राष्ट्रीय सर्वेेक्षण आयोजित किया गया। इसका उद्देश्य यह समझना था कि क्या चीज प्रभावी रूप से काम कर रही है और आगे बढ़ने के लिए कहाँ मेहनत करने की जरूरत है। सर्वेक्षण में 250 शहरों से 62000 नागरिकों ने भाग लिया और सर्वेक्षण में 170,000 से ज्यादा मत प्राप्त हुए जिसके चलते यह अपनी तरह का सबसे बड़ा सर्वेक्षण बन गया। हर वह नागरिक जिसने इस सर्वेक्षण में मत दिया है, लोकलसर्कल्स में उसकी विस्तृत जानकारी के साथ पंजीकृत है और ज्यादातर मामलों में नागरिकों ने अपना सही आवासीय पता बताया है।

लगभग 69 प्रतिशत प्रतिवादी पुरूष थे और 31 प्रतिशत प्रतिवादी महिलाएँ थी। लगभग 41 प्रतिशत प्रतिवादी प्रथम श्रेणी शहर, 28 प्रतिशत द्वितीय श्रेणी शहर और 31 प्रतिशत तृतीय श्रेणी शहर और गाँवों से थे। सर्वेक्षण में भाग लेने वाले प्रतिवादी की औसत उम्र 34 वर्ष थी।

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के. यतीश राजावत - media@localcircles.com

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